बढ़ते टी-20 के बीच टेस्ट को है और विराटो, स्टोक्सो की जरूरत

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टेस्ट क्रिकेट को बचाने की कवायद पर बहस लगातार जारी रहती है। कुछ दिनों पहले साउथ अफ्रीका ने अपनी घरेलू टी-20 लीग में मुख्य खिलाड़ियों की उपलब्धता के लिए न्यूज़ीलैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज में कई बड़ो नामों को नहीं चुना। टीम में सात ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने पहले कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टेस्ट क्रिकेट नहीं खेला था। इसके बाद कई पूर्व खिलाड़ियों की प्रतिक्रियाएं आई। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान स्टीव वां ने तो यहां तक कह दिया कि न्यूज़ीलैंड के लिए यह एक अपमान की तरह है और उन्हें यह सीरीज नहीं खेलनी चाहिए। भारत ने कुछ दिन पहले साउथ अफ्रीका के खिलाफ दो टेस्ट मैचों की सीरीज खेली थी जिस पर फिर खेल पंडितों ने सवाल उठाए कि दो मैचों की सीरीज का कोई औचित्य बनता ही नहीं है। बढ़ते टी-20 फ्रेंचाईजी क्रिकेट का असर क्रिकेट के सबसे पुराने फॉर्मेट पर पड़ा है। खिलाड़ी अब अपने देश से खेलने के ऊपर फ्रेचाईजी क्रिकेट को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। यहां तक की वह ज्यादा से ज्यादा लीग के लिए उपलब्ध रहें इसके लिए उन्हें रिटायरमेंट लेने में भी संकोच नहीं है। न्यूज़ीलैंड के तेज गेंदबाज ट्रेंट बोल्ट ने अपने आप को देश के सलाना कान्ट्रैक्ट से भी बाहर कर लिया था। यहीं नहीं साउथ अफ्रीका के क्विंटन डी कॉक ने भी पहले लिमिटेड  ओवर्स के लिए टेस्ट क्रिकेट से रिटायरमेंट ले लिया और फिर टी-20 लीगों के लिए लिमिटेड ओवर्स से दूरी बना ली है। फ्रेंचाईजी क्रिकेट की मोटी रकम ने अब टेस्ट के बाद वनडे पर भी अपना बुरा प्रभाव डालना शुरू कर दिया है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण वेस्टइंडीज क्रिकेट है। एक समय वर्ल्ड क्रिकेट पर राज करने वाले कैरेबियन्स इस समय अपने इतिहास के सबसे गर्त पर पहुंच चुके हैं। हद तो तब हो गई जब 2023 वनडे वर्ल्ड कप में वेस्टइंडीज क्वालीफाई नहीं कर पाया। वेस्टइंडीज टीम का शर्मनाक प्रदर्शन इस बात को बयां नहीं करता है कि यहां टैलेंट और स्किल की कमी है बल्कि वास्तविकता यह है कि खिलाड़ियों में अपने देश के लिए खेलने का वह जूनून नहीं बचा है जो 70 और 80 के दशक में दिखता था। खिलाड़ी अपने देश से ज्यादा टी-20 लीग खेलते हैं, जिससे 20 ओवर की गेम खेलते-खेलते 50 ओवर या टेस्ट फॉर्मेट के लिए जरूरी स्किल में भी कमी आई है।

साउथ अफ्रीका के धाकड़ बल्लेबाज हेनरिक क्लासेन ने टेस्ट क्रिकेट से रिटायरमेंट ले लिया है। क्लासेन का टेस्ट करियर चार मैचों तक ही सीमित था और वह टेस्ट में अपनी टीम के लिए भविष्य की योजना का हिस्सा भी नहीं लग रहें थे लेकिन इससे यह बात निकलकर आती है कि क्या खिलाड़ियों में वह इच्छा ही नहीं बची कि करियर में एक बार सफेद जर्सी तो जरूर पहननीं है और इसके लिए वह इंतजार करें।

ऐसा नहीं नहीं टेस्ट से प्यार करने अब नहीं बचे हैं। भारत से विराट कोहली, इंग्लैंड से बेन स्टोक्स, ऑस्ट्रेलियाई से स्टार्क, कमिंस और स्मिथ सहित कई विभिन्न देशों से अन्य खिलाड़ी भी है लेकिन आने वाली पीढ़ी में टेस्ट को और विराट, स्टोक्स ,स्मिथ की जरूरत है।

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