रावलपिंडी जैसी है एजबेस्टन की पिच, क्या इसे बिलो एवरेज श्रेणी में रखनेका साहस करेगा ICC

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एशेज सीरीज़ के पहले टेस्ट में इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड ने इतनी
सपाट पिच क्यों बनाई, यह सवाल उस टीम के लिए उठना लाज़िमी है क्योंकि यह
टीम ऑस्ट्रेलिया से अपने घर में पिछले 23 साल से कोई मैच नहीं हारी है।
क्या ऑस्ट्रेलिया के वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियनशिप का खिताब जीतने से
इंग्लैंड उससे डरने लगा है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बर्मिंघम के एजबेस्टन मैदान की पिच वास्तव में
इतनी सपाट है कि यहां गेंदबाज़ों के लिए कुछ नहीं है। न मूवमेंट, न
स्विंग और न ही उछाल। यह बात जगजाहिर है कि इंग्लैंड के कुछ क्रिकेटर
सपाट पिच पर ही बड़ी पारियां खेलते रहे हैं। जैक क्राली ऐसे ही खिलाड़ी
हैं जिन्होंने लंच से पहले कवर पॉइंट, स्कवेयर लेग और मिड-ऑफ की ओर कई
अच्छे शॉट खेले और शानदार हाफ सेंचुरी बनाई। अगर लंच से ठीक पहले बोलैंड
की गेंद उनके ग्लव्स से लगकर विकेटकीपर के हाथों में न गई होती तो वह
यहां एक बड़ी पारी ज़रूर खेलते दिखाई देते। वैसे भी क्राली सपाट पिचों पर
बड़ी पारियां खेलने के मास्टर माने जाते हैं। चाहे वह साउथैम्प्टन में
पाकिस्तान के खिलाफ उनकी डबल सेंचुरी हो या फिर रावलपिंडी टेस्ट में उनकी
सेंचुरी, दोनों ही बार पिचें बेजान थी, जिसका उन्हें फायदा मिला।

यह एक ऐसी पिच है जहां बल्लेबाज़ ग़लती करे तो ही वह आउट हो सकता है।
आईसीसी ने रावलपिंडी की पिच को तो बेहद सपाट कहकर उसे औसत से भी निचले
दर्जे की पिच करार दिया था। क्या अब आईसीसी ऐसा साहस कर पाएगा। इसी पिच
के पेच का यह असर था कि पहले दस ओवर में ही इंग्लैंड को नाथन लॉयन को
गेंदबाज़ी मोर्चे पर लगाना पड़ा और उसमें वह सफल भी हुए। ऑस्ट्रेलिया
हैज़लवुड और कमिंस की मौजूदगी में हाल के वर्षों में स्पिनरों पर इतना
निर्भर कभी नहीं हुआ।

दरअसल ऑस्ट्रेलिया जानता था कि इंग्लैंड अपना बैज़बॉल अंदाज़ छोड़ने वाला
नहीं है। पिच में कुछ दम नहीं था। इसीलिए पैट कमिंस ने डिफेंसिव फील्ड
लगाई। इस फील्ड से रन तो रोके जा सकते हैं लेकिन गेंदबाज़ पर दबाव नहीं
बनाया जा सकता। अगर पहले ही दिन कोई टीम इस मैदान पर इतने डिफेंसिव
माइंडसेट से खेलती है तो इस टेस्ट के बाकी के दिनों में पिच की सम्भावित
प्रवृति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

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