फेडरेशन के चुनाव कबड्डी की ओलिम्पिक भागीदारी की ओर एक बड़ा कदम

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दीपक हुड्डा

आज सरकार खेलों के लिए बहुत कुछ कर रही है। यहां तक कि जो खिलाड़ी देश के लिए पदक जीत रहे हैं, उन्हें विदेशों में ट्रेनिंग की सुविधाएं दी जा रही हैं। अच्छे उपकरण मुहैया कराए जा रहे हैं और इसी का नतीजा है कि भारत ने हाल में एशियाई खेलों और पैरा एशियाई खेलों में सबसे ज़्यादा पदकों का रिकॉर्ड तोड़ा। पिछले ओलिम्पिक और पैरा ओलिम्पिक में भी यही स्थिति रही।

यहां ज़रूरत ग्रास रूट लेवल पर प्रतिभाओं को तराशने और उन्हें मदद देने की ज़रूरत है। हमारे गांव में एक से बढ़कर एक प्रतिभा है। मेरे मां बाप बचपन में गुजर गए। 12वीं में मेरी पढ़ाई छूट गई। जीवन-यापन के लिए काफी स्ट्रगल करना पड़ा। उसके बावजूद मैने कबड्डी खेल को हमेशा गम्भीरता से लिया और मुझे खुशी है कि इस खेल में मुझे भारतीय टीम की

कप्तानी करने का भी मौका मिला। मेरा खेल ताक़त और स्टेमिना से जुड़ा है, जहां अच्छी खुराक की ज़रूरत होती है। गावं देहात में मैंने कितनी ही प्रतिभाएं देखी हैं जो 1600 मीटर की दौड़ चार मिनट के आसपास पूरी कर लेते हैं। दिक्कत यह है कि इन प्रतिभाओं के पास परिवार की भी ज़िम्मेदारी होती है। किसी के परिवार में बूढ़े मां-बाप है तो कहीं अन्य आर्थिक समस्याएं हैं जो एक अच्छे खिलाड़ी के रूप में उभर नहीं पातीं। इस स्तर पर इन प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास ज़रूर होने चाहिए। अगर इसी दिशा में सरकार ने कदम उठाए तो मेरा मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और भी ज़्यादा पदकों का अम्बार लग जाएगा।

दूसरे, फेडरेशन की आपसी खींचतान से भी इस खेल का काफी नुकसान हुआ है। 2018 के एशियाई खेलों में हम कबड्डी का स्वर्ण पदक दोनों वर्गों में गंवा चुके हैं। जल्द ही फेडरेशन के चुनाव होंगे तो निश्चय ही स्थिति में बदलाव आएगा। फिर हम इस खेलों को ओलिम्पिक में मान्यता दिलाने की दिशा में भी गम्भीरता से प्रयास कर सकते हैं। इस खेल में काफी स्कोप है। आज कबड्डी लीग होने से खिलाड़ियों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का मौका मिला है। हमारे खेल में पहले भी अर्जुन पुरस्कार दिए जाते थे मगर तब खिलाड़ियों को बहुत कम लोग जानते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। पीकेएल की वजह से अर्जुन पुरस्कार पाने वाला खिलाड़ी चर्चा में आ जाता है। आज कबड्डी का खेल एशियाई खेलों और दक्षिण एशियाई खेलों में काफी पॉपुलर हो चुका है। अब तो हमारे खेल की वर्ल्ड चैम्पियनशिप भी होने लगी है। अब हर कबड्डी खिलाड़ी की इच्छा इस खेल को ओलिम्पिक तक पहुंचाने की है। इसमें फेडरेशन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर कबड्डी प्रेमियों की यह मुराद पूरी हो गई तो भारत ओलिम्पिक में इस खेल से गोल्ड मेडल की उम्मीद ज़रूर कर सकता है।

(लेखक भारतीय कबड्डी टीम के पूर्व कप्तान हैं)

 

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